जब पूरी दिल्ली रावण को मारने के लिए कटे कबंध सड़क पर निकली हुई है उस वक्त पहाड़ इससे बेखबर अपनी योगिनियों को जगा रहा है। वह जानता है कि राक्षस को मारने के लिए पहले देवी को जगाना होगा, नीचे मैदान में लाना होगा।
साधु और शैतान के बीच प्रेत होने की कला
श्रीकांत वर्मा सम्मान को लेकर हुई फजीहत और आलोचना के बाद अशोक वाजपेयी ने कह दिया कि वे बीस बिस्वा के ब्राह्मण हैं और जो उनके कार्यक्रम में नहीं आएगा उसको वे श्राप दे देंगे। अब हमारे यहां श्राप तो प्रेत ही देते हैं, चाहे जिंदा हों या मृत! श्राप वही देता है जो प्रेत योनि में अटका हुआ हो, अतृप्त हो। अशोक वाजपेयी की अतृप्ति पहले से समझ में आती रही है, इसलिए उनके श्राप का क्या ही बोझ लेना! इस हफ्ते कहानी कला के क्षेत्र से एक बड़े साधक की, जिसकी मौत हुए अस्सी साल हो रहे हैं लेकिन जिसे समझना आज भी टेढ़ी खीर है।
राय कृष्णदास की कोठी टूट गई पर काशी की परंपरा बच गई!
क्या यह समाचार सामान्य है कि बनारस के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने अपने तीन अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार एक संग्रहालय को दे दिए, घर में निजी संपत्ति की तरह नहीं रखे? इसकी पिछले हफ्ते के समाचार से तुलना कर के देखिए, जब जीवन की ढलती शाम में एक बुजुर्ग नौकरशाह कवि ने महज 21 लाख रुपये के सम्मान के लिए पूरी परंपरा, विरासत, आत्मछवि और नैतिकताबोध को ताक पर रख दिया था!
वर्मा परिवार के वाजपेय यज्ञ में एक समिधा अपनी भी…
हिंदी भाषा में सत्ता के प्रति व्यवहार, विचार और लेखन की यह उभयवृत्ति भारतेन्दु का डाला हुआ मूल बीज है। उसी बीज से हिंदी के तमाम पौधे, पादप, बरगद, उनकी शाखा-प्रशाखाएं निकली हैं। अशोक वाजपेयी अपवाद नहीं हैं। नामवर सिंह भी नहीं थे। राजेंद्र यादव भी नहीं। सबने अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से सत्ता के सुख लिए, चारण बने, तो बागी भी रहे। यही हिंदी का मूल स्वभाव है।
दो सौ साल पहले विलायती कपड़े से शुरू हुई एक कहानी
अभी तो जी20 का जोर-जबर ही ठंडा नहीं पड़ा है, फिर ये नया नाम ब्रिक्स किसी की जबान पर कैसे चढ़ सकता है इतनी जल्दी! ये बात इससे समझ पड़ती है कि उस दिन शास्त्री भवन के पास पेड़ के नीचे बाल काटने वाले फुरकान ने बड़ी मासूमियत से पूछा था- भइया, ये जी ट्वेंटी फिर से होने जा रहा है क्या?
बनारस का भुला दिया गया मनीषी जिसने ज्ञान को सहेजना सिखाया
बनारस के सतीश चंद्र गुहा, जिन्होंने इस देश को पहली बार सिखाया कि अपनी प्राचीन किताबों और ज्ञान को कैसे सहेजना है, बाँट-छाँट कर सजाना है, ताकि पढ़ने की जरूरत पड़े तो ढूँढने की मेहनत न करनी पड़े। जिन्होंने 1942 में किसी समय गुहा को अवकाशप्राप्त जीवन बिताते बनारस के कमच्छा मोहल्ले में खादी के धोती-कुर्ते में देखा था और बाद में उन पर लिखा, यह कहानी वहीं से साभार है।
चढ़ती बारिश है, सांप काट ले तो क्या करें? एक प्राचीन नुस्खा
‘उदन्त मार्तण्ड’ के 7 नवम्बर 1826 के अंक में सांप के विष की औषधि प्रकाशित हुई थी। इसका शीर्षक था- ‘सर्प दंशन विष उतारने की ओषधि’। इसे नीचे अविकल प्रकाशित किया जा रहा है। इस लेख को ‘विशाल भारत’ में पुनर्प्रकाशित करने वाले ब्रजेन्द्रनाथ बनर्जी ने साथ में अपनी टिप्पणी लिखी है कि ‘’मालूम नहीं यह औषधि कहां तक उपयोगी है’’!
