दुनिया 200 साल बाद

दिल्ली रावण मारने निकली है, पहाड़ योगिनियों को जगा रहा है…

जब पूरी दिल्‍ली रावण को मारने के लिए कटे कबंध सड़क पर निकली हुई है उस वक्‍त पहाड़ इससे बेखबर अपनी योगिनियों को जगा रहा है। वह जानता है कि राक्षस को मारने के लिए पहले देवी को जगाना होगा, नीचे मैदान में लाना होगा।

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दुनिया 200 साल बाद

साधु और शैतान के बीच प्रेत होने की कला

श्रीकांत वर्मा सम्मान को लेकर हुई फजीहत और आलोचना के बाद अशोक वाजपेयी ने कह दिया कि वे बीस बिस्वा के ब्राह्मण हैं और जो उनके कार्यक्रम में नहीं आएगा उसको वे श्राप दे देंगे। अब हमारे यहां श्राप तो प्रेत ही देते हैं, चाहे जिंदा हों या मृत! श्राप वही देता है जो प्रेत योनि में अटका हुआ हो, अतृप्त हो। अशोक वाजपेयी की अतृप्ति पहले से समझ में आती रही है, इसलिए उनके श्राप का क्या ही बोझ लेना! इस हफ्ते कहानी कला के क्षेत्र से एक बड़े साधक की, जिसकी मौत हुए अस्सी साल हो रहे हैं लेकिन जिसे समझना आज भी टेढ़ी खीर है।

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दुनिया 200 साल बाद

राय कृष्णदास की कोठी टूट गई पर काशी की परंपरा बच गई!

Bharat Kala Bhawan

क्‍या यह समाचार सामान्‍य है कि बनारस के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने अपने तीन अंतरराष्‍ट्रीय पुरस्‍कार एक संग्रहालय को दे‍ दिए, घर में निजी संपत्ति की तरह नहीं रखे? इसकी पिछले हफ्ते के समाचार से तुलना कर के देखिए, जब जीवन की ढलती शाम में एक बुजुर्ग नौकरशाह कवि ने महज 21 लाख रुपये के सम्‍मान के लिए पूरी परंपरा, विरासत, आत्‍मछवि और नैतिकताबोध को ताक पर रख दिया था!

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दुनिया 200 साल बाद

वर्मा परिवार के वाजपेय यज्ञ में एक समिधा अपनी भी…

हिंदी भाषा में सत्ता के प्रति व्‍यवहार, विचार और लेखन की यह उभयवृत्ति भारतेन्‍दु का डाला हुआ मूल बीज है। उसी बीज से हिंदी के तमाम पौधे, पादप, बरगद, उनकी शाखा-प्रशाखाएं निकली हैं। अशोक वाजपेयी अपवाद नहीं हैं। नामवर सिंह भी नहीं थे। राजेंद्र यादव भी नहीं। सबने अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से सत्ता के सुख लिए, चारण बने, तो बागी भी रहे। यही हिंदी का मूल स्‍वभाव है।

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1826 के झरोखे से

दो सौ साल पहले विलायती कपड़े से शुरू हुई एक कहानी

अभी तो जी20 का जोर-जबर ही ठंडा नहीं पड़ा है, फिर ये नया नाम ब्रिक्‍स किसी की जबान पर कैसे चढ़ सकता है इतनी जल्‍दी! ये बात इससे समझ पड़ती है कि उस दिन शास्‍त्री भवन के पास पेड़ के नीचे बाल काटने वाले फुरकान ने बड़ी मासूमियत से पूछा था- भइया, ये जी ट्वेंटी फिर से होने जा रहा है क्‍या?

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दुनिया 200 साल बाद

बनारस का भुला दिया गया मनीषी जिसने ज्ञान को सहेजना सिखाया

Sayaji Rao Gaekwad Central Library, BHU

बनारस के सतीश चंद्र गुहा, जिन्होंने इस देश को पहली बार सिखाया कि अपनी प्राचीन किताबों और ज्ञान को कैसे सहेजना है, बाँट-छाँट कर सजाना है, ताकि पढ़ने की जरूरत पड़े तो ढूँढने की मेहनत न करनी पड़े। जिन्होंने 1942 में किसी समय गुहा को अवकाशप्राप्त जीवन बिताते बनारस के कमच्छा मोहल्ले में खादी के धोती-कुर्ते में देखा था और बाद में उन पर लिखा, यह कहानी वहीं से साभार है।

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1826 के झरोखे से

चढ़ती बारिश है, सांप काट ले तो क्या करें? एक प्राचीन नुस्खा

Snake Charmers in Kolkata, 1945, by Norman Herfort

‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ के 7 नवम्‍बर 1826 के अंक में सांप के विष की औषधि प्रकाशित हुई थी। इसका शीर्षक था- ‘सर्प दंशन विष उतारने की ओषधि’। इसे नीचे अविकल प्रकाशित किया जा रहा है। इस लेख को ‘विशाल भारत’ में पुनर्प्रकाशित करने वाले ब्रजेन्‍द्रनाथ बनर्जी ने साथ में अपनी टिप्‍पणी लिखी है कि ‘’मालूम नहीं यह औषधि कहां तक उपयोगी है’’!

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