दुनिया 200 साल बाद

मक्‍खी और परवाने का किस्‍सा

आज 14 जून हो गया। छह जून को जंतर-मंतर पर इस देश के शिक्षा मंत्री की ‘तेरहवीं’ की जो मीयाद कॉकरोचों ने रखी थी वह बीत गई। इस्‍तीफा नहीं हुआ। अल्‍टीमेटम की मीयाद अब बदल चुकी है। अब वे फिर आएंगे। 20 जून को। आखिर रोशनी खोजने वापस वहीं लौट-लौट कर कौन आता है? जिसको सर्टिफिकेट चाहिए…! इस बारे में एक दिलचस्‍प कहानी सुनाते हैं उस्‍ताद फ़रीद अयाज़…

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दुनिया 200 साल बाद

दिल्ली में मोबाइल चोरों के नाम एक दिन

संसद मार्ग थाने में पुलिस ने 10-15 चोरों को बिठा रखा था क्योंकि खुद दिल्ली पुलिस के एक अफसर का मोबाइल चोरी हो गया था। इसी वजह से पुलिस मुस्तैद हुई और नौजवान का फोन मिल गया।

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1826 के झरोखे से

ठट्ठे की बात : मुरदे की जोरू और एक खानदानी मुकदमा

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उदन्‍त मार्तण्‍ड में कभी-कभी बड़ी मनोरंजक बातें छपा करती थीं। उदाहरण के लिए आषाढ़ वदी 1 संवत 1883 के मार्तण्‍ड में प्रकाशित हुआ था- ‘फरासीस देशकी खबर’।

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दुनिया 200 साल बाद

पर्यावरण पर पालेबाजी से आखिर किसकी जान पहले बच जाएगी?

Press Conference 22 May PCI

जिन्‍हें जनजातियों के पर्यावरण की चिंता थी, उन्‍हें तो दिल्‍ली के प्रेस क्‍लब में सुनने के लिए कायदे से तीस लोग भी नहीं आए थे। इन्‍होंने जो चिट्ठी भेजी है प्रधान जज को पिछली 22 तारीख को, वो शायद उन्‍हें मिल गई होगी। उस पर देश भर से 340 लोगों के दस्‍तखत हैं, लेकिन वे उसे क्‍यों पढ़ेंगे?

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दुनिया 200 साल बाद

दो सौ साल पुराने सूर्य के आभासी पुनरुदन्‍त पर एक औपचारिकता

हर साल की 30 मई की तरह इस बार भी हिंदी पत्रकारिता दिवस को रस्‍मी तौर से मनाकर लोग फारिग हो जाएंगे और अपने-अपने काम-धंधों में लग जाएंगे। फिर? शायद ढाई सौ साल होने पर इसे याद करें! वह घड़ी बहुत दूर नहीं है?

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दुनिया 200 साल बाद

हिंदुस्‍तान का कॉकरोच प्रसंग और मलेशिया की एक कविता

Cecil Rajendra

दशकों पहले मलेशियाई अधिवक्‍ता और कवि सेसिल राजेंद्रा ने यह विलक्षण कविता लिखी थी जो इस प्रसंग की मूर्खता को कहीं बेहतर ढंग से अभिव्‍यक्‍त करती है, बजाय इसके कि इस पर कोई आडंबरपूर्ण संपादकीय लिखा जाय!

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दुनिया 200 साल बाद

क्योंकि ब्‍योंड़े के टूट जाने पर किला देर तक नहीं बचता…

अबकी उन्‍हें भी अहसास हो गया था, शायद इसीलिए उन्‍होंने भारतीय जनता पार्टी को लगातार ‘बाहरी’ और ‘जमींदार’ बताकर चुनाव प्रचार किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बंगाल के लिए ‘विदेशी’ भाजपा को रोकने वाली ‘देसी’ ताकतों की जमीन छिन चुकी थी जबकि उसे बढ़ाने वाली विभाजनकारी हवा समूचे बंगाल को घेर चुकी थी।

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